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Sunday, February 14, 2016

“वैलेंटाइन डे” – जरुर मनाएं अगर आप उसे समझते है तो!

कई दिनों से मैं १४ फ़रवरी की प्रतीक्षा कर रहा था. इसलिए नहीं कि मुझे अपनी प्रेमिका को कोई विशेष उपहार देना था (वैसे मेरी कोई प्रेमिका है भी नहीं) बल्कि इसलिए ताकि मैं ये लेख बिलकुल सही समय पर आप तक पहुंचा सकूँ. पिछले कई दिनों से जहाँ देखो वहां इस विशेष दिन की चर्चा हो रही है. सभी लोग इस दिन कि प्रतीक्षा कर रहे थे, बस कारण अलग अलग था. युवा पीढ़ी जहाँ इसका इंतजार इस वजह से कर रही थी ताकि वे अपने प्रेमी अथवा प्रेमिका को ये बता सकें कि वे उनसे कितना प्रेम करते हैं. शिवसेना और बजरंगदल वाले इस ताक में थे कि इस दिन वे इस कुप्रथा के विरोध की आड़ लेकर फिर से अपनी राजनीति चमका सकें. मेरा कारण कुछ और है. मैं बस आप लोगों को एक कहानी सुनना चाहता हूँ. आशा है कि जब तक आप इस कहानी के अंत तक पहुंचेगे, कुछ लोग मुझसे सहमत होंगे और कुछ मुझे गलियां दे रहे होंगे. खैर, जो होगा देखा जाएगा. तो कहानी आरम्भ करते हैं.

कहानी यहाँ की नहीं है, कहानी है रोम की. कहानी हाल की भी नहीं है, कहानी है आज से करीब १७०० साल पहले की. कहानी है तीसरी शताब्दी की, सन २५० AD (ईसा की मृत्यु से लगभग २५० वर्ष पश्चात्) की. रोम का हमेशा से विश्व राजनीति एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है लेकिन ये कहानी रोम की राजनीति की नहीं बल्कि वह की संस्कृति की है. ये वो जमाना था जब रोम और लगभग पुरे यूरोप के लिए जीवन का अर्थ केवल अपनी वासनाओं की पूर्ति करना था. ये वो जमाना था जब रोम में शारीरिक सम्बन्ध कुछ अधिक हीं खुले रूप में स्वीकार किये जाते थे. एक पुरुष का कई स्त्रियों से और स्त्री का कई पुरुषों के साथ सम्बन्ध होना बहुत हीं आम बात थी. और “कई” का मतलब यहाँ दो चार साथी से नहीं है. स्वयं अरस्तु जैसे विचारक ने ये स्वीकार है कि अपने जीवनकाल में उनका लगभग २३ स्त्रियों के साथ सम्बन्ध रहा था. अब जब अरस्तु जैसे विद्वान की ये दशा थी तो आम लोगों के हालत का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं. कुल मिला कर बात ये थी कि रोम में नैतिकता की कोई जगह नहीं थी और पूरा का पूरा समुदाय केवल भोग विलास में डूबा रहता था.

उसी काल में एक संत हुआ करते थे. मुझे नहीं पता कि वे इस व्यवस्था को किस तरह देखते थे लेकिन कुछ समय पश्चात् उन महाशय को भारतीय दर्शन को पढने का अवसर प्राप्त हुआ. मैं ठीक ठीक तो नहीं बता सकता कि किस प्रकार वे भारतीय दर्शन को प्राप्त कर पाए लेकिन भारत का उन दिनों कई देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था खासकर मसालों के निर्यात की वजह से. कदाचित उस वजह से ही उन्हें ये मौका मिला हो. जब उन महाशय ने भारतीय दर्शन का अध्ययन किया तो वे अवाक् रह गए. उन्हें पता चला कि भारत में एक पुरुष किसी एक स्त्री के प्रति और एक स्त्री किसी एक पुरुष के प्रति समर्पित रहती हैं. वे इस बात को जान कर आश्चर्यचकित रह गए कि भारत में इस बात को निश्चित करने के लिए कि एक स्त्री एवं पुरुष एक दुसरे के प्रति इमानदार रहें, वहां एक सामाजिक व्यवस्था है जिसे “विवाह” कहते हैं. उनका चौंकना वाजिब हीं था क्योंके वे जिस समाज में रहते थे वहां के लोग केवल एक स्त्री अथवा प्रुरुष के प्रति गंभीर होने के विषय में सोच तक नहीं सकते थे. काफी गहनता से अध्यन करने के उपरांत उन्होंने ने पाया कि भारतीय संस्कृति का ये पहलू वाकई शानदार है. इसके कई फायदे उन्हें समझ में आये. मसलन इस व्यवस्था में यौन सम्बन्धी रोगों के होने की सम्भावना ना के बराबर थी. हम सभी ये जानते हैं कि आजकल एड्स और जितने भी प्रकार के यौन रोग हैं वे भारत के अपने नहीं हैं बल्कि सब के सब बाहरी दुनिया से हमारे देश में आये. दूसरी कमाल की बात ये थी कि भारतीय समाज में इस व्यवस्था के कारण सभी लोगों को अपने कुल एवं परिवार का ज्ञान होता था. आज भी हमें अपनी कई पीढ़ियों के बारे में पता होता है. चुकि यूरोप में शारीरिक संबंधों की कोई परिभाषा हीं नहीं थी इसी कारण ये पता करना असंभव था कि कौन किसकी संतान है और कौन किसका पिता, जो जाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में संभव नहीं है.

उन महाशय को ये व्यवस्था इतनी पसंद आयी कि उस दिन के बाद से उन्होंने ये बात छोटी छोटी सभाएं कर आम जनता को बताना शुरू कर दर दिया. जैसी कि अपेक्षा थी अधिकतर लोगों ने उनका मजाक उडाया और उन्हें पागल तक करार दे दिया. कोई भी अपने आनंद की दुनिया से बाहर निकलना नहीं चाहता था. लेकिन इक्के दुक्के हीं सही लेकिन कुछ लोगों को उनकी बात समझ में आने लगी. चुकि वे एक पादरी थे इसीलिए जिन स्त्री अथवा प्रुरुष को उनकी बात समझ में आती थी, वे उनका विवाह अपने चर्च में करवा देते थे. उनका ये प्रयास समय के साथ साथ बढ़ता हीं गया और उन्होंने ऐसा एक दो साल नहीं बल्कि लगभग उन्नीस बीस सालों तक किया. इन सालों में रोम में विवाहित लोगों की तादात बहुत बढ़ी और उन्हें आदर्श बना कर सैकड़ों लोगों ने खुद आगे आकर इस व्यवस्था को अपनाया.

लेकिन कहते हैं ना कि अच्छी चीजों को बिना किसी मुसीबत के करते रहना बड़ा मुश्किल है. उन दिनों रोम पर “क्लोडियस” का शासन था. क्लोडियस रोम के सबसे क्रूर राजाओं में से एक माना जाता था. उसे एक दिन पता चला कि एक व्यक्ति घूम घूम कर विवाह जैसी प्रथा का प्रचार कर रहा है तो उसने उन महाशय को अपने राजदरबार बुलाया. उसने उनसे पूछा कि क्या कारण है कि वे रोम की संस्कृति को भ्रष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं. क्लोडियस के अनुसार जीवन केवल भोग-विलास के लिए था और वे महाशय विवाह को प्रचारित कर उनके भोग-विलास की सीमा को सीमित कर रहे थे. क्लोडियस ने उनसे अपना ये अभियान बंद करने को कहा किन्तु उन महाशय ने ये कहते हुए इससे इंकार कर दिया कि उस समय रोम के लोग किसी जानवर की भांति अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे और विवाह प्रथा उन्हें इंसान बनाने के लिए एक बेहतरीन शुरुआत थी. जैसी की उम्मीद थी, क्लोडियस ने उन्हें सरेआम फांसी देने का दंड सुनाया. सन १९५० तक यूरोप में फांसी की सजा सरेआम ही दी जाती थी. वैसा हीं हुआ. उन महाशय ने जिन जिन लोगों की शादियाँ करवाई थी उन सब की आँखों के सामने १४ फरवरी सन २६९ को उन महाशय को सूली पर चढ़ा दिया गया. उनका नाम था “संत वैलेंटाइन”.

वैलेंटाइन नहीं रहे लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था. उनके अनुयायियों ने उनकी बरसी के दिन “वैलेंटाइन डे” मानना शुरू कर दिया. उस दिन रोम में अगर किसी पुरुष को कोई महिला अथवा किसी महिला को कोई पुरुष पसंद आता था तो वे उनके पास जाकर उन्हें कहते थे “Will you be my Valentine?” इसका वास्तविक अर्थ होता था “क्या आप मुझसे शादी करेंगी अथवा करेंगे?” ये इतना बड़ा परिवर्तन था कि उस दिन के बाद से वैलेंटाइन डे धीरे-धीरे पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गया. समय बीता और पश्चिम की बांकी संस्कृतियों के साथ वैलेंटाइन डे ने भारत में प्रवेश किया, लेकिन किस रूप में ये बताने की कोई आवश्यकता नहीं है. भारत में करोडो लोग हर साल वैलेंटाइन डे मानते हैं किन्तु उसके पीछे कितना पवित्र उद्येश्य था उसका ज्ञान किसी को नहीं. कोई ये नहीं जानता और कोई ये जानना भी नहीं चाहता कि आखिर वो वैलेंटाइन डे मना किस लिए रहे है? सच तो ये है कि भारत में वैलेंटाइन डे केवल गुलाब, चॉकलेट्स और उपहारों तक हीं सीमित रह गया है.

ऐसा नहीं है कि वैलेंटाइन डे का इतिहास केवल मुझे मालूम है. गूगल पर खोजिये और आपको इसका पूरा इतिहास मिल जाएगा. श्री राजीव दीक्षित ने इसके बारे में एक सभा की थी पर अफ़सोस उसे मीडिया में जगह नहीं मिली. मिडिया के प्रति मेरा गुस्सा भी उनके दोतारफे रवैये के लिए है. जो मिडिया बड़े से बड़े राज को खोज लेती है वही मिडिया कभी भी इस दिन के पीछे की सच्चाई को नहीं दिखाती. दरअसल दिखा भी नहीं सकती. अगर सब लोग इस दिन के पीछे छुपे उद्येश्य को जान लेंगे तो वैलेंटाइन डे के नाम पे जो ये बेवकूफी हो रही है वो बंद हो जाएगी जिसका सबसे ज्यादा असर इससे होने वाले व्यापार पर पड़ेगा. और ये रकम कितनी बड़ी है उसका अंदाजा आप सिर्फ इससे लगा सकते हैं कि इस साल वैलेंटाइन डे पर केवल गुलाबों की बिक्री से करीब २००० करोड़ रूपये के व्यापार की सम्भावना है. सिर्फ गुलाबों से. बांकी उपहारों की कीमत का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं. सच हीं तो है, देश की संस्कृति से किसी को क्या लेना देना? संस्कृति भाड़ में जाये पर हजारों करोड़ का नुक्सान नहीं होना चाहिए.

आप सभी कृपया ये न समझें कि इस पोस्ट को लिखने का मेरा मकसद आपके वैलेंटाइन डे के आयोजनों को बर्बाद करना है. आप चाहे वैलेंटाइन डे मनाएं या इंडिपेंडेंस डे, उससे मेरा कोई लेना देना नहीं है. इस लेख को लिखने का मेरा मकसद केवल इतना है कि कम से कम आप इस विशेष दिन के पीछे छुपे विशेष मकसद को समझे. अगली बार जब आप किसी के कहने वाले हों “Will you be my Valentine?”, आपको पता होना चाहिए कि आखिर इसका मतलब क्या है. आजकल छोटे छोटे बच्चे अपने माता पिता तक को वैलेंटाइन कार्ड्स दे देते हैं. वे इसे क्या समझते हैं मुझे नहीं मालूम पर इस बेवकूफी को क्या कहें कुछ समझ में नहीं आता? प्रेमी प्रेमिका होना किसी भी तरह से गलत नहीं है लेकिन वैलेंटाइन डे सिर्फ गुलाब, चोकोलेट्स और उपहारों तक सीमित नहीं है. इसका वास्तविक अर्थ है सच्चा प्रेम और अपने प्रेम को विवाह का रूप देकर एक मंजिल तक पहुचाना. इस पोस्ट को पढने के बाद अगर कोई एक युगल भी वैलेंटाइन डे की असली भावना को समझ सका तो मैं समझूंगा इसे आपतक पहुचाना सार्थक रहा. अगर इस लेख में आपको थोड़ी भी सच्चाई दिखे तो कृपया इसे शेयर करें. यही आपकी सबसे बड़ी सहायता होगी.

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