Oct 2, 2012

स्वयंवर - अंतिम अध्याय

भीष्म अपने और परशुराम के बीच होने वाले युद्ध को टालने में असफल रहते है और अंततः उन्हें परशुराम से युद्ध करना पड़ता है. सारी हस्तिनापुर इससे चिन्तित है कि क्षत्रियों के शत्रु परशुराम से भीष्म किस प्रकार युद्ध कर पाएँगे किन्तु उनके बीच भीषण युद्ध होता है. संसार एक ऐसा युद्ध देखता है जिसे उसने इससे पहले कभी नहीं देखा. उन दोने के युद्ध का परिणाम क्या होता है? अम्बा का क्या होता है? और आखिर ऐसी क्या बात थी जिसकी वजह से स्थिति इतनी गंभीर हो गयी. इन सब चीजों के लिए मैं आपसे इस उपन्यास को पढ़ने का अनुरोध करता हूँ. इसे पढ़ें और अपनी राय मुझे अवश्य भेजें. 

“चिंता न करूँ?” सत्यवती के आँखों से आसुओं की बाढ़ सी आ गयी. उसने भीष्म के सर को अपने हाथों में लेते हुए कहा “ये जो कुछ हो रहा है वो केवल मेरे कारण हीं हो रहा है. मैं हीं वो पापिन हूँ जिसके कारण तुमने अपना पूरा जीवन बर्बाद कर दिया और ये मेरे हीं पाप है कि आज तुम मृत्यु के इतने समीप खड़े हो. मुझे मृत्यु भी तो नहीं आती. तुम्हारी महानता के सामने तो स्वयं महान शब्द भी छोटा है पुत्र. भीष्म, अगर तुम मेरे पुत्र न होते तो मैं तुम्हारे चरण स्पर्श कर लेती.” 

... इसी अध्याय से ...