Dec 21, 2009

चालक (कंडक्टर), कुचालक (इन्सुलेटर) और अर्धचालक (सेमीकंडक्टर)

किसी भी वस्तु में करंट प्रवाहित होने का मतलब है की उसमे से एलेक्ट्रोंस प्रवाहित हो रहे हैं. यह जाहिर सी बात है की कुछ वस्तुएं अपने द्वारा एलेक्ट्रों प्रवाहित होने देती हैं, कुछ नहीं देती हैं और कुछ को इसके लिए बाध्य किया जा सकता है. इन्हीं गुणों के आधार पर हम चालक, कुचालक तथा अर्धचालकों में अंतर करते हैं. चालक वह वस्तु है जिसमे आसानी से एलेक्ट्रोंस का प्रवाह हो सकता है. उदाहरण के लिए आप किसी भी धातु को ले सकते हैं जैसे लोहा, चांदी, सोना इत्यादि. कुचालक वो हैं जिसमे से एलेक्ट्रोंस या करंट प्रवाहित नहीं हो सकते जैसे लकड़ी, पत्थर, प्लास्टिक इत्यादि. अर्धचालक उसे कहते हैं जो चालक तथा कुचालक दोनों तरीके से काम करता है अर्थात उसे हम अपने हिसाब से ढाल सकते हैं. सिलिकन तथा जेर्मेनियम इसके उदाहरण हैं.

किसी भी वस्तु में दो स्तर होते हैं जिसे हम वैलंस बैंड तथा कंडकशन बैंड कहते हैं. इन दोनों कि बीच कि दूरी फोर्बिडन गैप कहलाती है. किसी भी वस्तु में एलेक्ट्रोंस प्रवाहित होना इस बात पर निर्भर करता है की क्या एलेक्ट्रोंस वैलंस बैंड से कंडकशन बैंड में जा सक रहा है या नहीं. अगर हाँ तो इसका मतलब है की उस वस्तु में करंट प्रवाहित हो रहा है.

जैसा की आप इस चित्र में देख सकते हैं कि कुचालक में फोर्बिडन गैप बहुत ज्यादा होता है इसलिए एलेक्ट्रोंस वैलंस बैंड से कंडकशन बैंड में नहीं जा सकता. इसलिए कुचालक में एलेक्ट्रोंस यानि करंट का प्रवाह नहीं हो सकता. चालक में दोनों बैंड मिले हुए रहते हैं मतलब फोर्बिडन गैप नहीं रहता है इसलिए इसमें से एलेक्ट्रोंस या करंट आसानी से प्रवाहित होते हैं.

अब रहा अर्धचालक का सवाल तो जैसा कि आप देख सकते हैं कि इसमें फोर्बिडन गैप न कम है और न ज्यादा. सामान्य अवस्था में एक अर्धचालक कुचालक का कार्य करता है मतलब सामान्य अवस्था में इससे करंट प्रवाहित नहीं हो सकता लेकिन जब हम इसमें थोडा बल लगते हैं तो इलेक्ट्रान वैलंस बैंड से कंडकशन बैंड में चला जाता है. इसी बल को हम वोल्टेज कहते हैं. मतलब वोल्टेज को घटा बढ़ा कर हम अर्धचालक को चालक तथा कुचालक दोनों तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं. अर्धचालक का यही गुण पूरे इलेक्ट्रोनिक्स जगत का आधार है.

सामान्य अवस्था में अर्धचालक कुचालक की तरह काम करता है जब हम धीरे धीरे वोल्टेज बढ़ाते हैं तो एक समय तक तो ये एलेक्ट्रोंस को प्रवाहित नहीं होने देता लेकिन जब वोल्टेज इसकी क्षमता से ज्यादा बढ़ जाता है तो ये एलेक्ट्रोंस के प्रवाह को रोक नहीं पता और एक चालक के रूप में काम करने लगता है. इसकी यह क्षमता नी वोल्टेज (knee voltage) कहलाती है. सिलिकन की नी वोल्टेज 0.7 वोल्ट होती है तथा जर्मेनियम की 0.3 वोल्ट. मतलब 0 .7 वोल्ट के बाद सिलिकन में और 0.3 वोल्ट के बाद जर्मेनियम में करंट बहना चालू हो जाता है. इसे आप नीचे बने चित्र से समझ सकते है. चूँकि सिलिकन का नी वोल्टेज ज्यादा होता है और उसमे सर्किट कंट्रोल की सम्भावना ज्यादा होती है इसलिए हम जर्मेनियम के बदले सिलिकन का ही प्रयोग करते हैं.