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Wednesday, March 29, 2017

सर्विस टैक्स छूट की जमीनी हकीकत

कुछ दिनों से ये चर्चा बड़ी गर्म थी कि अब खाने के बाद सर्विस टैक्स देना अनिवार्य नहीं है। अगर आपकी इच्छा हो तो दें या ना दें। ये किसी भी आम आदमी के लिए बहुत बड़ी खबर थी।

साधारण सी बात है कि अगर आप अपने परिवार के साथ कही खाने जाते हैं और 1000 रूपये का बिल बनता है तो 15% सर्विस टैक्स के साथ 150 रूपये अतिरिक्त देने होते है। यही नहीं उस सर्विस टैक्स पर आपको 6% वैट भी देना होता है। यानि 9 रूपये। तो 1000 के कुल खर्च पर आपको 159 रूपये की अच्छी खासी रकम देनी पड़ती है। पता नहीं आपने ध्यान दिया है या नहीं पर कई रेस्टॉरेंट पूरे बिल पर वैट और सर्विस टैक्स अलग अलग काटते हैं। यानी 1000 रूपये पर 210 रूपये अतिरिक्त।

आजकल लोगों की आमदनी काफी तेजी से बढ़ी है और शायद इसी कारण हम सीधे टोटल को देखते हैं। मेरे जैसे कई व्यक्ति जिन्हें इससे चिढ भी होती है तो भी केवल इसी लिए चुप रह जाते है कि इतनी छोटी रकम के लिए कौन चिक चिक करे? यकीन मानिए यही छोटी छोटी चीजें एक दिन आपको सड़क पर ला सकती है। खैर टैक्स का विश्लेषण हम कभी और भी कर सकते हैं।

आज इस पोस्ट को लिखने का कारण कुछ और है। पिछले कई दिनों से मैने कई बार सोचा कि सर्विस टैक्स देने से मना करू और फिर देखूं कि उनकी ओर से क्या जवाब आता है लेकिन कर नहीं पाया। एक दिन निश्चय करके मैंने बैंगलोर के एक होटल में सर्विस टैक्स देने से मना कर दिया तो उन्हें जैसे फर्क ही नहीं पड़ा। बहस से बचने के लिए मैंने पूरा भुगतान किया। बैंगलोर से वैसे भी मेरा 36 का आंकड़ा है इसलिए मैंने ज्यादा सर नहीं फोड़ा लेकिन उसके बाद हैदराबाद, कोलकाता और अब भागलपुर में भी जब मैंने सर्विस टैक्स देने से मन किया तो सब ने किसी ना किसी रूप में मना कर दिया। भागलपुर में तो जवाब सबसे हास्यप्रद था। उनके हिसाब से सर्विस टैक्स को वैकल्पिक बनाने का निर्णय अभी तक भागलपुर पर लागू नहीं हुआ है। खैर...

अब सवाल ये है कि क्या वाकई ये नियम भारत सरकार की ओर से बनाये गए है? अगर हाँ तो क्या आपमें से कोई इसको सत्यापित कर सकता है? अगर ये नियम वाकई में हैं तो फिर भारत सरकार इसे किस प्रकार से मॉनिटर कर रही है? सबसे अहम् सवाल कि अगर कोई होटल इस नियम को मानने से इंकार कर देता है तो हमारे पास क्या विकल्प है? क्या उसकी शिकायत कही की जा सकती है?

इस सबसे पहले, टैक्स लेने का हिसाब किताब आखिर क्या है? जब हम खाना खरीदते है तो वो कोई डब्बाबंद तो होता नहीं जिसपर वैट (सेल्स टैक्स) लगाया जा सके। दूसरी बात अगर आप वैट लगा रहे हैं तो फिर आपको अपने सामान को बोचने के लिए सर्विस तो देनी ही होगी। फिर उसपर सर्विस टैक्स लगाने का क्या तुक है? अगर हम खाना केवल पार्सल करवा रहे हैं उस स्थिति में भी आप सर्विस तो कुछ दे नहीं रहे है फिर सर्विस टैक्स का भुगतान ग्राहक क्यों करे? और सबसे अजीब बात कि ये वैट और सर्विस टैक्स एक साथ लगाना कहाँ का पागलपन है?

क्या आपने से कोई और भी इस तरह की मनमानी का शिकार हुआ है? अगर हाँ, तो कृपया अपना अनुभव साझा कीजिये। पता तो चले कि आखिर ये हो क्या रहा है?

Tuesday, February 21, 2017

बैंगलोर का वाकई कोई जवाब नहीं

आज मेरे साथ कुछ ऐसा घटा जिससे मेरी दृष्टि में बैंगलोर की महानता में एक और उपलब्धि जुड़ गयी। मैं आज किसी काम से विप्रो के इलेक्ट्रॉनिक सिटी ऑफिस में गया था जो मेरे घर से काफी दूर है। वापसी में एक छोटे सी दुर्घटना के कारण मेरे पैरों में थोड़ी चोट लग गयी। मैं काफी दूर से पैदल आ रहा था लेकिन चोट लगने के कारण आगे चलने में थोड़ी तकलीफ हुई। उस वक्त मैं विप्रो के गेट नंबर ११ पर था जहाँ से विप्रो बस स्टैंड महज ५०० मीटर की दूरी पर है। पहले मैंने एक ऑटो वाले से पूछा और जैसी कि मुझे उम्मीद थी, उसने आधे किलोमीटर चलने के लिए २०० रूपये माँगे। शायद उसे भी मेरी मजबूरी का पता चल चुका था। मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उसे क्या कहूँ? बहुत क्रोध आया लेकिन मैंने उससे कुछ कहा नहीं। जाते जाते वो कुछ मोल भाव करने लगा लेकिन उस समय तक मुझे उसके ऑटो में मुफ्त में भी जाने की इच्छा नहीं थी।

जैसे ही मैं आगे बढ़ा, एक व्यक्ति बाइक पर आया और मेरे पास रुक गया। वो Concentric Technology में काम करता था। मैंने उससे अनुरोध किया कि क्या वो मुझे अगले मोड़ तक छोड़ सकता है? उसने मुझे बिठा लिया और दो मिनट बाद मैं विप्रो बस स्टॉप पर था। मैंने उसका शुक्रिया अदा किया और जाने लगा कि अचानक उसने मुझसे ५० रूपये माँगे। एक पल को तो मुझे समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है? तुरंत ही मुझे समझ में आ गया कि वो मुझसे लिफ्ट देने की फीस मांग रहा है। मैं इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं था। मुझे जरा भी अपेक्षा नहीं थी कि एक पढ़ा लिखा व्यक्ति जो इतनी बड़ी कंपनी में काम करता है मुझसे लिफ्ट देने के पैसे मांगेगा। मेरे मुँह से सिर्फ इतना निकल "५० रूपये?" और उसने बड़ी शालीनता से जवाब दिया "हाँ बैंगलोर में यही रेट लगता है।"

मैं अवाक् था लेकिन बात बढ़ाना नहीं चाहता था। मैंने उसे १०० रूपये का नोट दिया और उसने इस प्रकार मुँह बनाया जैसे आजकल दुकानदार २००० का नोट देख कर बनाते हैं। वो लगभग सड़क के बीच में खड़ा था जिससे पीछे के वाहनों ने हॉर्न बजाना शुरू कर दिया। उसने जल्दी से जेब से १०-१० के तुड़े मुड़े नोट निकले और मेरे हाँथों में थमा दिया। इससे पहले कि मैं उसे गिनता, वो व्यक्ति तेजी से वहां से चलता बना। मैंने बाद में देखा, उसमे केवल ३० रूपये थे।

मुझे उस समय कितना गुस्सा आया मैं यहाँ बता नहीं सकता। उस समय वो तीस रूपये पकडे मुझे बहुत ही ज्यादा शर्म आ रही थी। गुस्से में मैंने वो तीस का नोट वही सड़क पर फेंका और वापस अपने घर की ओर चल दिया। पूरे रास्ते मैं केवल यही सोच रहा था कि आखिर आज ये हुआ क्या? यकीन मानिये इस पोस्ट को लिखते हुए भी मैं गुस्से से कांप रहा हूँ। 

मैंने सालों साल निकल दिए। इस देश के २७ राज्यों में रह और घूम चुका हूँ। सैकड़ों लोगों से लिफ्ट ली है लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। इतनी जगहों पर रहने के बाद भी लगता है जैसे बैंगलोर कोई अलग देश ही है। कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट शेयर किया था जिसमे मैंने बताया था कि कोलकता में मैंने राज्य सरकार की AC बस से सफर किया था जिसमे १९ किलोमीटर के लिए मुझे केवल ४५/- रूपये ही लगे थे और उसी १८ किलोमीटर के सफर के लिए मुझे बैंगलोर राज्य सरकार की AC बस में २६०/- रूपये लगे थे। इतना अंतर? आखिर किस लिए? क्या यहाँ की बसों में सोने चांदी की कुर्सियां है? ऐसी क्या खासियत है कि यहाँ पर जनता से दूसरे राज्यों की अपेक्षा ६-७ गुणा तक किराया वसूला जा रहा है? अगर आप घर लेने जायेंगे तो आपसे इतना पैसा मुँह खोल कर माँगते हैं जैसे पूरे देश में केवल उन्ही का घर किराये पर उपलब्ध है। उसके ऊपर १० महीने से लेकर १ साल तक का किराया सिक्योरिटी के रूप में भी चाहिए उन्हें। क्यों भाई? हम सभी इतनी मेहनत इसी कारण कर रहे हैं क्या कि आपकी जेबें भरते फिरें? इन सब के ऊपर से आज की घटना ने तो इस शहर के प्रति मेरी घृणा और बढ़ा दी है। लोग कहते हैं कि बैंगलोर इतना खूबसूरत शहर है। घंटा खूबसूरत है। उस खूबसूरती का हम लोग जैसे आम लोग अचार डालेंगे क्या? आखिर इतनी बेमतलब की महँगाई क्यों? जितनी जल्दी हो सके मैं इस नर्क से निकलना चाहता हूँ। अगर पेट का सवाल नहीं होता तो कब का ये शहर छोड़ चुका होता। यहाँ इमारतें महँगी हैं और इंसान सस्ते। 

बैंगलोर शहर की खूबसूरती देखने अवश्य आइये लेकिन साथ ही ये भी देखने की कोशिश कीजिये कि इस शहर में पैसे का कैसा बोलबाला है। पैसे के लिए इतना नीचे गिरने वाला शहर आपको पूरे भारत में ढूंढने में बड़ी मुश्किल होगी।

अंत में सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि बैंगलोर के निवासियों को शायद मेरी इन बातों से कष्ट पहुँच सकता है। लेकिन ईश्वर के लिए मेरी इस भावना को किसी व्यक्ति अथवा समुदाय से जोड़ने का प्रयास ना करें। जो भी उदगार निकला है वो पूर्ण रूप से मेरा अपना है।  

Tuesday, January 10, 2017

LOT 980 Dumps (IBM Certified Associate Administrator - Lotus Notes/Domino 8.5)

  1. While you used the Domino Administrator client, what two subtabs may be found under the Messaging tab?
    1. Mail and tracking center
    2. Router and mailboxes
    3. Mail users and SMTP configuration
    4. Mail statistics and mail analysis
  2. Joes is creating a new password for himself. Which one of the following will "password quality checking" indicate is the least secure password?
    1. All uppercase passwords
    2. Mixed case passphrases
    3. Words found in Notes dictionaries during spell check
    4. Passphrases containing numbers and punctuation
  3. In addition to Notes databases, which of the following file on a Domino server should be backed up in order to ensure that new users can be created in case of loss of the server?
    1. The user's desktop.dsk file
    2. The server's bookmark.nsf file
    3. Cache.dsk
    4. Certified ID files
  4. Ben attempts to send Jerry a Notes mail message. Both users are on the same mail server. Which of the following paths will the message take?
    1. The SMTP task will receive the message from Ben and immediately send it to Jerry aster following the SMTP to Notes path defined in the configuration settings documents for the mail server
    2. The Router will receive the message from Ben and deliver it immediately to Jerry's mailfile via NRPC
    3. The server will receive the message from Ben and send it to the mail hub for distribution back to the mail server and then deliver to Jerry's mailfile
    4. The Router will receive the message from Ben and deliver it immediately to Jerry's mailfile via SMTP
  5. You have the ability to set different levels of administration access to users. Which of the following represents the hierarchy order for privileges from greatest to least access?
    1. Full Console administrator > System Administrator > Full Access administrator > Administrator
    2. Server administrator > View Console administrator > Administrator > User administrator
    3. Full server access administrator > Console rights administrator > User administrator > View access only administrator
    4. Full access administrator > Administrator > Full console administrator > System administrator
  6. Tom set up a Domino domain and organization. Which one of the following describes the difference between a Domino domain and a Domino organization?
    1. A Domains define security and naming conventions. Organizations are comprised of users and servers that share a common Domino Directory.
    2. Domains are comprised of users and servers that share a common Domino Directory. Organizations define security and naming conventions.
    3. Domains refer to a company's hierarchical structure. Organizations refer to users who share a common organizational certifier.
    4. There is no difference. Domains and organizations function in the same manner.
  7. Why did Tom designate Server1/Boise/Acme as the Administration Server for the Domino Directory?
    1. To make sure that all new users were registered on Server1/Boise/Acme.
    2. To prevent users from making changes to the Domino Directory on Server1/Boise/Acme.
    3. To force administrators to make all changes to the Domino Directory on Server1/Boise/Acme.
    4. To ensure that the Administration Process would process all Domino Directory changes on Server1/Boise/Acme.
  8. The server Web1/XYZ defaults to Server document settings to obtain configuration information for Internet protocols when which of the following features is not enabled?
    1. Global Domain documents
    2. Single Sign-on documents
    3. Internet Site documents
    4. Web Configuration documents
  9. In what order would Richard build a naming convention for his organization where user names would have the following format: Chris Maxwell/Amsterdam/Acme & AJ Mathis/Sydney/Acme
    1. Create two Organizational (O) Certifiers named Acme and use one to create an Organizational Unit (OU) Certifier named Amsterdam and the other O Certifier to create an OU Certifier named Sydney
    2. Create a common Name (CN) Certifier named Acme and then create Organizational (O) Certifiers named Amsterdam and Sydney
    3. Create an Organizational (O) Certifier named Acme and then create Organizational Unit (OU) certifiers named Amsterdam and Sydney
    4. Create a Organizational (O) Certifier named Amsterdam, an Organizational (O) Certifier named Sydney and an Organizational Unit (OU) certifier named Acme
  10. Susan has created a list of IP Addresses for the web server that are allowed access and a list of IP Addresses that are denied access. Both are placed in the appropriate fields. Which field take precedence BY DEFAULT when the same IP address is found in both lists?
    1. The Deny Access field
    2. An error will be presented stating an address may not be in both fields
    3. The substitution Access field
    4. The Allow Access field
  11. OCSP on the Domino server is enabled through which of the following?
    1. A Server configuration document
    2. Security policy
    3. Certificate authority database
    4. Server document
  12. John is setting up a single domain with a single organization. As a result, all Domino server IDs must be created using which one of the following?
    1. The same organizational (O) certificate or a child of the organizational (O) certificate
    2. The same cross-certificate
    3. The same administrator certificate
    4. The same country (C) certificate or a child of the country (C) certificate
  13. You are building Domino Domain Monitoring probes in Domino 8.5 and wish to create a standard Possible Solution for all of them. Which of the following document types allow this capability?
    1. Corrective
    2. Embedded
    3. Component
    4. Modular
  14. Which one of the following group types is used to prevent access to Domino servers?
    1. Servers only
    2. Deny list only
    3. Mail only
    4. Access Control List only
  15. Where does the Domino Server Setup program store the certifier ID file by default?
    1. In any network drive location that you specify during installation
    2. In the directory you specify as the Domino data directory during installation
    3. On the Domino Administrator's local machine in My Documents\Lotus\Certifiers directory
    4. In the Domino Name and Address Book
  16. John registered a new server. In which one of the following was the Server document placed?
    1. DIRECTORY.NSF
    2. CATALOG.NSF
    3. CERTLOG.NSF
    4. NAMES.NSF
  17. Terry is working on a document in a database on a server that is DAOS enabled. While in the document, Terry replaces the attachment with a new version. Which of the following occurs to the attachment in the DAOS store?
    1. The server removes the previous attachment entirely from DAOS and inserts the link to the new attachment
    2. The server adjusts references to the attachment in DAOS
    3. The server sends the full previous attachment to all user mail file that pointed to that original file reference
    4. The server removes the reference from all mail files that pointed to that original file reference
  18. Jon registered a new user. Which one of the following authentication elements is NOT found in that user's ID file?
    1. Private key
    2. HTTP password
    3. Certificates
    4. Public key
  19. Your Organizational certifier is named Acme. Each city in your company has an Organizational Unit certifier from the Acme certifier that references the city. Susan wants to create an Organizational Unit certifier below the city organizational Unit certifier. Which one of the following must she have to accomplish this?
    1. A copy of the city's Organizational Unit certifier
    2. A copy of the Acme Organizational certifier
    3. Copies of both the Acme Organizational certifier and the location's Organizational Unit certifier
    4. Reader access to the domain's directory
  20. In which of the following databases may you view all the database ACLs on a server by user name, access level, or by database?
    1. Log
    2. Certlog
    3. Names
    4. Catalog

Thursday, December 15, 2016

How to enable webpage to change Domain User's password in Windows 2012 Server

In a large environment, we can't give every Administrators, access to Active Directory servers to reset the password. I am going to tell you how we can enable a Webpage to achieve the same goal. You don't need to install any third party software for that. Everything will be done by core Microsoft services.
  • Open "Server Manager" and click on "Remote Desktop Services" and then "Next".
 
  • In "Role Services" screen, click on following roles to install. It will ask to add few additional features. Click on "Add Features" to add them.
    • Remote Desktop Connection Broker
    • Remote Desktop Session Host
    • Remote Desktop Web Access

  • In "Web Server Role (IIS)" screen, keep all default settings selected.

  • In confirmation screen, click on "Install" to install the role. Once it's done, click on "Finish" and then reboot your server.

  • After reboot, open "Internet Information Services (IIS) Manager" and navigate to "Server Name -> Sites -> Default Web Site -> RDWeb -> Pages". At right side, you will find "Application Settings" icon. If' the screen is in "Content View", you will not see all these options. In that case you can right click on "Pages" and set it to "Features View".

  • Double click on "Application Settings" and there you will find "PasswordChangeEnabled" option. Double click on "PasswordChangeEnabled" and set it to "true" and click "OK".

  • Once it's done, open your Internet Explorer and access this URL: https://FullServerName/RDWeb/Pages/en-US/password.aspx. Where Server Name will be your FQDN of your server (e,g. server1.abc.com) or you can use the IP Address of your server. It will give a security warning for SSL, please accept it and the it will land you to the Password Change webpage.

  • You can provide this link to your Administrators to change the password without disturbing the main Active Directory server.

Thursday, October 27, 2016

"Jio" - बाप रे बाप!

जब से रिलायंस ग्रुप ने "जिओ" को लांच करने की बात की थी, पूरे टेलीकॉम जगत में जैसे हलचल सी मच गयी थी। ऑफर भी जबरदस्त था। कुछ भी करो सब मुफ्त। और हम सभी जानते हैं कि मुफ्त की चीजों की भारत में कितनी इज्जत और जरुरत है। मैं भी हैरान था कि आखिर कोई कंपनी इतनी कीमत पर डाटा और मुफ्त में कॉल क्यों उपलब्ध करवा रही है? वैसे ख़ुशी भी थी क्योंकि इससे बाँकी कंपनियों की मनमानी बंद हो जानी थी जो लगातार डाटा की कीमतें बढ़ा रहे हैं। तो आज मैं जियो के बारे में अपना अनुभव बाँटना चाहता हूँ। 

उससे पहले २००९ में चलते हैं। मैं नया नया दिल्ली में आया था और एक मोबाइल नंबर लेना चाहता था (उस समय मोबाइल पोर्टेबिलिटी का विकल्प नहीं था)। मेरे एक परिचित ने कहा कि नया नंबर लेने की क्या जरुरत है? तुम मेरा रिलायंस का सिम इस्तेमाल कर लो। सबसे सस्ता है। मैंने देखा कि रेट्स तो वाकई जबरदस्त हैं। कोई और मोबाइल कंपनी उनके प्लान्स के आस-पास भी नहीं थी। मैं बड़ा खुश था। फटाफट जाकर २०० रूपये का रिचार्ज करवा आया। फिर मैंने सोचा कि सब को फ़ोन करके अपना नंबर दे दूं। घर फ़ोन मिलाया तो नेटवर्क बिजी आया। फिर किया, फिर बिजी। करता रहा, करता रहा और कुछ २५-३० प्रयासों के बाद फ़ोन मिला। मैंने सोचा शायद आज समस्या है किन्तु पता चला कि रिलायंस के साथ ये हमेशा की समस्या है। कई बार इतना चिढा कि फ़ोन पटकते पटकते खुद को रोकना पड़ा। मैंने २०० रुपयों में केवल ५-६ रूपये खर्च किये फिर रिलायन्स को छोड़ने का फैसला किया। ये स्थिति थी कि मैं अपने अकाउंट में पड़े पूरे रुपयों को खर्च भी नहीं कर पाया। अंततः हार कर मैंने एयरटेल का सिम लिया जिसमे कभी कोई समस्या नहीं आयी। हालाँकि बाद में एयरटेल को भी छोड़ना पड़ा पर वो कहानी फिर कभी। 

वापस आते हैं। हमारे ऑफिस में जिओ वालों ने एक काउंटर लगाया था। कई बार सोचा कि मैं भी सिम ले लूँ पर भीड़ देख कर हिम्मत नहीं हुई। एक दिन जब वे थोड़ा जल्दी आ गए और ज्यादा भीड़ नहीं थी, मैं फटाफट अपना आधार कार्ड लेकर पहुँच गया। उन्होंने बताया कि आपका आधार कार्ड बिहार का है इसलिए आप बिहार में ही जिओ सिम ले सकते हैं, कलकत्ता में नहीं। बड़ी हैरानी हुई। अरे भाई! फिर आधार कार्ड का अर्थ हीं क्या है? "Aadhaar - one nation one identity" का क्या मतलब हुआ। बहस करने का कोई फायदा नहीं हुआ और मैं वापस आ गया। 

पिछले हफ्ते मैं अपने घर भागलपुर में था। घर से कंपनी का काम करने के लिए इन्टरनेट चाहिए था और वोडाफोन पर 3G बड़ा महँगा पड़ रहा था। सोचा यहाँ जिओ ले लूँ तो समस्या हल हो जाएगी। बहुत खोजा पर कही भी सिम उपलब्ध नहीं था। फिर पता चला कि ब्लैक में सिम मिल सकता है। अरे वाह! अभी तक तो ब्लैक में सिनेमा की टिकटें बिकती थी पर अब सिम कार्ड भी? सोचा थोड़ा खर्चा कर अगर मिल सकता है तो ले ही लेता हूँ। कम से कम महँगे इन्टरनेट से मुक्ति तो मिलेगी। फटाफट "MyJio" ऍप डाउनलोड किया और अपना कोड उपलब्ध हो गया। आधार कार्ड लेकर स्टोर पर पहुँचा। फिंगरप्रिंट दिए और अपना कोड उन्हें दिया। ये क्या? उन्होंने कहा कि आपका कोड किसी ने हैक कर लिया है। मैंने पूछा क्या सचमुच? ये कोड भी हैक होता है? उन्होंने कहा अजी क्या कहें? जिओ की इतनी मारामारी है कि पूछिये मत। मैंने कहा अब क्या उपाय है? उन्होंने कहा कि हम कोई और कोड डाल देंगे पर उसका १०० रुपया अलग से लगेगा। मरता क्या ना करता, कहा डाल दो। तो भाईसाहब ने मेरे वाले सीरीज के कोड्स ट्राय करना शुरू कर दिया। मैंने हँसता हुआ देखता रहा। शायद इसी तरह से कोड हैक किया जाता है। २०-२५ मिनट के अथक परिश्रम के बाद उन्हें एक कोड मिल गया और मुझे मेरा जिओ नंबर। उन्होंने कहा २ घंटों में आपका सिम शुरू हो जायेगा। ५०० रूपये सिम के (ब्लैक में) और १०० रूपये कोड के (जो उसने किसी और का हैक कर लिया) देने पड़े पर मन बड़ा प्रसन्न था। 

घर आया। सिम के एक्टिवेशन का मैसेज आ गया। सिम लगाया तो पता चला कि सिग्नल ही नहीं आ रहा। घर में इधर उधर घूम कर देखा तो अंततः सिग्नल का एक डंडा आया। चलो कुछ तो मिला। फटाफट लैपटॉप कनेक्ट किया पर ब्राऊज़र घूमता ही रहा। स्पीड ऐसी थी कि 2G भी शरमा जाये। बड़ी समस्या थी। बेकार का पैसा चला गया। काम करने के लिए अपने वोडाफोन नंबर को ही इस्तेमाल करना पड़ा। सोचा चलो कोई बात नहीं। इन्टरनेट नहीं चल रहा तो क्या हुआ रोमिंग में मुफ्त फ़ोन तो कर सकूँगा। फ़ोन लगाया तो फ़ोन लगा ही नहीं। यहाँ तक कि जिओ वेरिफिकेशन भी नहीं कर पा रहा था। बड़ा गुस्सा आया। वापस स्टोर गया तो उन्होंने कहा आज भर रुक जाइये कल से चालू हो जायेगा। चलो ये भी ठीक है। अगला दिन आया फिर भी फ़ोन नहीं लगा। फिर स्टोर पहुँचा तो बड़ा क्रन्तिकारी जवाब मिला "आपका इन्टरनेट तो चल रहा है ना? फ़ोन किसी का नहीं लग रहा। आप अभी इन्टरनेट से ही काम चलाइये। वैसे भी मुफ्त में कंपनी और क्या क्या देगी?" जवाब सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। अरे यार मैंने थोड़े ही बोला था सबकुछ फ्री देने को? पैसे ही ले लेते पर बढ़िया सर्विस तो देते। खैर क्या करता वापस आ गया। जैसे तैसे कछुआ छाप इन्टरनेट को ही इस्तेमाल किया। 

लगातार कोशिश कर रहा था कि कॉल की सेवा शुरू हो जाये। अनंत प्रयासों के बाद आखिर एक बार वैरीफ़िकेशन नंबर मिला और सिम एक्टिवटे हो गया। सोचा चलो एक काम तो हुआ। एक फ्री की कॉल तो बनती है। फ़ोन मिलाया, नहीं मिला। दो बार, तीन बार, चार बार... ३८ बार मिलाने के बाद भी कॉल नहीं लगा तो हिम्मत जवाब दे गयी। दूसरों को कहा उस नंबर पर कॉल करने को तो उन्होंने भी कहा कि मिल ही नहीं रहा। सोचा फ़ोन ही ख़राब हो गया क्या? पर जब वोडाफोन से मिलाया तो तुरंत मिला। एयरटेल, बीएसएनएल, एयरसेल सबको ट्राय किया किसी में कोई समस्या नहीं हुई। जिओ को दुसरे फ़ोन में इस्तेमाल किया तो भी वही समस्या। अंत में मैंने उससे फ़ोन मिलाना ही छोड़ दिया। सोचा जब कलकत्ते जाऊंगा तो बढ़िया 4G सिग्नल मिलेगा और कॉल भी लगेगी। कलकत्ता पहुँचा तो सिग्नल में एक और डंडे की बढ़ोत्तरी हुई पर स्पीड वही 2G वाली। कॉल लगाया तो लगा नहीं। हर बार एक देवीजी नेटवर्क के बिजी होने की सूचना देती थी। हालात तो ये हैं कि कॉल मिलाते ही एक सेकंड के अंदर नेटवर्क बिजी का मैसेज आ जाता है। लगता है जैसे रिकार्डेड मैसेज चला रखा हो। आज सिम को लिए ७ दिन हो चुके हैं और सैकड़ों बार नंबर मिलाने के बाद भी मैं इससे केवल दो कॉल ही कर पाया हूँ। इन्टरनेट के साथ समस्या ये है कि जिओ केवल 4G/LTE बैंड पर ही काम करता है। मतलब ये कि हम तो अपनी स्पीड पे नहीं ही चलेंगे पर अगर आप कम स्पीड पे चलना चाहें तो वो भी हमारे शान के खिलाफ है। कसम से २००९ का दिल्ली वाला वाकया याद आ गया। खैर जो भी हो। एक फ़ालतू सिम के लिए मैं अपना बी.पी. नहीं बढ़ा सकता।

अंततः समझ में आया कि श्री मुकेश अम्बानी हर चीज फ्री क्यों दे रहे थे। अरे भाई अगर कॉल लगेगी ही नहीं तो फ्री ही हुई ना? और श्री नरेंद्र मोदी ने भी शायद बिना सोचे अपना चेहरा और डिजिटल इंडिया का टैग जिओ को दे दिया। एक बार इस्तेमाल तो कर लिया होता श्रीमान। आपने भी कान पकड़ लिए होते। रही बात शाहरुख़ खान साहब की तो उन्हें तो अपना चेहरा (जो मैं तो नहीं देखना चाहता) दिखने के पैसे मिल ही चुके होंगे। ये भी समझ में आ गया कि जनता को मूर्ख बनाने में केवल सरकारी विभाग ही कुशल नहीं है। प्रतिभावान लोगों की कमी थोड़े ही है विश्व में। 

जाते जाते मैं सिर्फ एक बात श्री मुकेश अम्बानी से पूछना चाहूंगा। अगर कोई व्यक्ति विशेषकर महिला विपत्ति में फँस जाये और उसके पास केवल आपका महान जिओ सिम हो तो उसे होने वाली हानि (जो कभी कभी बहुत ही गंभीर हो सकती है) का जिम्मेदार कौन होगा? मेरे विचार में जब कोई भी मुसीबत में हो तो वो कभी भी ये नहीं सुनना चाहेगा - "इस रुट की सभी लाइनें अभी व्यस्त हैं। कृपया थोड़ी देर बाद प्रयास करें।"

Friday, October 14, 2016

Understanding FSMO Roles: Part-1

I remember when I started working as Windows Admin several years ago, FSMO (Flexible Single Master Operations) was one kind of nightmare for me. I Googled hundred times to find out what exactly it is, but found too theoretical/non-practical information. Now when I actually came to know what exactly it is, I find it simple. So I will try to explain it in a absolute layman language. Hope it will help many engineers like me. Also instead of explaining it in one shot, we will discuss one role at a time for better understanding.

So I hope everyone is aware of Forest and Domain concept in Windows. Domain is just a logical boundary which represents it's reach and limitation. For example, wipro.com is a domain which represents reach and limitation of all employee within the organization. We can't go beyond wipro.com and no one from outside can come inside it. If we have group of domains which belong to a single organization or infrastructure, it's called a forest and it's identified as the root domain. For example, wipro.com, mywipro.wipro.com, newmywipro.wipro.com, careers.wipro.com, itms.wipro.com etc, all are different domains but belong to a single organization Wipro Ltd., hence this group of domain is called as Forest which will be represent by the root domain, wipro.com. If we have only one domain in our infrastructure, by default that will also be the forest for that organization.

This is all for this post. In next post, we will discuss why we need FSMO roles, how many are they and how they can actually placed within the organization. In the meanwhile, your feedback and questions are welcome.

Thursday, June 9, 2016

Error: The Local Security Authority cannot be contacted - Windows 2012 Server

If you are upgraded your server to Windows 2012 Server, you might get a "Local Security Authority" error while connecting remotely (through RDP). It comes specially when you are trying to access the server of a different domain with another domain's ID in AD Trust environment. For example if abc.com is in trust with xyz.com and you are trying to access any server in xyz.com with abc.com's account, you may get this error.

















The solution is quite simple. 

  • Login to the server with either local admin account or account of the same domain.
  • Go to My Computer's property and click on "Remote settings"










  • Disable "Allow connections only from computers running Remote Desktop with Network Level Authentication (recommended)" option by un-checking it.






















  • Click on "Apply" and try to login again with other domain's account. Bingo! Your issue is resolved.

Sunday, February 14, 2016

“वैलेंटाइन डे” – जरुर मनाएं अगर आप उसे समझते है तो!

कई दिनों से मैं १४ फ़रवरी की प्रतीक्षा कर रहा था. इसलिए नहीं कि मुझे अपनी प्रेमिका को कोई विशेष उपहार देना था (वैसे मेरी कोई प्रेमिका है भी नहीं) बल्कि इसलिए ताकि मैं ये लेख बिलकुल सही समय पर आप तक पहुंचा सकूँ. पिछले कई दिनों से जहाँ देखो वहां इस विशेष दिन की चर्चा हो रही है. सभी लोग इस दिन कि प्रतीक्षा कर रहे थे, बस कारण अलग अलग था. युवा पीढ़ी जहाँ इसका इंतजार इस वजह से कर रही थी ताकि वे अपने प्रेमी अथवा प्रेमिका को ये बता सकें कि वे उनसे कितना प्रेम करते हैं. शिवसेना और बजरंगदल वाले इस ताक में थे कि इस दिन वे इस कुप्रथा के विरोध की आड़ लेकर फिर से अपनी राजनीति चमका सकें. मेरा कारण कुछ और है. मैं बस आप लोगों को एक कहानी सुनना चाहता हूँ. आशा है कि जब तक आप इस कहानी के अंत तक पहुंचेगे, कुछ लोग मुझसे सहमत होंगे और कुछ मुझे गलियां दे रहे होंगे. खैर, जो होगा देखा जाएगा. तो कहानी आरम्भ करते हैं.

कहानी यहाँ की नहीं है, कहानी है रोम की. कहानी हाल की भी नहीं है, कहानी है आज से करीब १७०० साल पहले की. कहानी है तीसरी शताब्दी की, सन २५० AD (ईसा की मृत्यु से लगभग २५० वर्ष पश्चात्) की. रोम का हमेशा से विश्व राजनीति एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है लेकिन ये कहानी रोम की राजनीति की नहीं बल्कि वह की संस्कृति की है. ये वो जमाना था जब रोम और लगभग पुरे यूरोप के लिए जीवन का अर्थ केवल अपनी वासनाओं की पूर्ति करना था. ये वो जमाना था जब रोम में शारीरिक सम्बन्ध कुछ अधिक हीं खुले रूप में स्वीकार किये जाते थे. एक पुरुष का कई स्त्रियों से और स्त्री का कई पुरुषों के साथ सम्बन्ध होना बहुत हीं आम बात थी. और “कई” का मतलब यहाँ दो चार साथी से नहीं है. स्वयं अरस्तु जैसे विचारक ने ये स्वीकार है कि अपने जीवनकाल में उनका लगभग २३ स्त्रियों के साथ सम्बन्ध रहा था. अब जब अरस्तु जैसे विद्वान की ये दशा थी तो आम लोगों के हालत का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं. कुल मिला कर बात ये थी कि रोम में नैतिकता की कोई जगह नहीं थी और पूरा का पूरा समुदाय केवल भोग विलास में डूबा रहता था.

उसी काल में एक संत हुआ करते थे. मुझे नहीं पता कि वे इस व्यवस्था को किस तरह देखते थे लेकिन कुछ समय पश्चात् उन महाशय को भारतीय दर्शन को पढने का अवसर प्राप्त हुआ. मैं ठीक ठीक तो नहीं बता सकता कि किस प्रकार वे भारतीय दर्शन को प्राप्त कर पाए लेकिन भारत का उन दिनों कई देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था खासकर मसालों के निर्यात की वजह से. कदाचित उस वजह से ही उन्हें ये मौका मिला हो. जब उन महाशय ने भारतीय दर्शन का अध्ययन किया तो वे अवाक् रह गए. उन्हें पता चला कि भारत में एक पुरुष किसी एक स्त्री के प्रति और एक स्त्री किसी एक पुरुष के प्रति समर्पित रहती हैं. वे इस बात को जान कर आश्चर्यचकित रह गए कि भारत में इस बात को निश्चित करने के लिए कि एक स्त्री एवं पुरुष एक दुसरे के प्रति इमानदार रहें, वहां एक सामाजिक व्यवस्था है जिसे “विवाह” कहते हैं. उनका चौंकना वाजिब हीं था क्योंके वे जिस समाज में रहते थे वहां के लोग केवल एक स्त्री अथवा प्रुरुष के प्रति गंभीर होने के विषय में सोच तक नहीं सकते थे. काफी गहनता से अध्यन करने के उपरांत उन्होंने ने पाया कि भारतीय संस्कृति का ये पहलू वाकई शानदार है. इसके कई फायदे उन्हें समझ में आये. मसलन इस व्यवस्था में यौन सम्बन्धी रोगों के होने की सम्भावना ना के बराबर थी. हम सभी ये जानते हैं कि आजकल एड्स और जितने भी प्रकार के यौन रोग हैं वे भारत के अपने नहीं हैं बल्कि सब के सब बाहरी दुनिया से हमारे देश में आये. दूसरी कमाल की बात ये थी कि भारतीय समाज में इस व्यवस्था के कारण सभी लोगों को अपने कुल एवं परिवार का ज्ञान होता था. आज भी हमें अपनी कई पीढ़ियों के बारे में पता होता है. चुकि यूरोप में शारीरिक संबंधों की कोई परिभाषा हीं नहीं थी इसी कारण ये पता करना असंभव था कि कौन किसकी संतान है और कौन किसका पिता, जो जाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में संभव नहीं है.

उन महाशय को ये व्यवस्था इतनी पसंद आयी कि उस दिन के बाद से उन्होंने ये बात छोटी छोटी सभाएं कर आम जनता को बताना शुरू कर दर दिया. जैसी कि अपेक्षा थी अधिकतर लोगों ने उनका मजाक उडाया और उन्हें पागल तक करार दे दिया. कोई भी अपने आनंद की दुनिया से बाहर निकलना नहीं चाहता था. लेकिन इक्के दुक्के हीं सही लेकिन कुछ लोगों को उनकी बात समझ में आने लगी. चुकि वे एक पादरी थे इसीलिए जिन स्त्री अथवा प्रुरुष को उनकी बात समझ में आती थी, वे उनका विवाह अपने चर्च में करवा देते थे. उनका ये प्रयास समय के साथ साथ बढ़ता हीं गया और उन्होंने ऐसा एक दो साल नहीं बल्कि लगभग उन्नीस बीस सालों तक किया. इन सालों में रोम में विवाहित लोगों की तादात बहुत बढ़ी और उन्हें आदर्श बना कर सैकड़ों लोगों ने खुद आगे आकर इस व्यवस्था को अपनाया.

लेकिन कहते हैं ना कि अच्छी चीजों को बिना किसी मुसीबत के करते रहना बड़ा मुश्किल है. उन दिनों रोम पर “क्लोडियस” का शासन था. क्लोडियस रोम के सबसे क्रूर राजाओं में से एक माना जाता था. उसे एक दिन पता चला कि एक व्यक्ति घूम घूम कर विवाह जैसी प्रथा का प्रचार कर रहा है तो उसने उन महाशय को अपने राजदरबार बुलाया. उसने उनसे पूछा कि क्या कारण है कि वे रोम की संस्कृति को भ्रष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं. क्लोडियस के अनुसार जीवन केवल भोग-विलास के लिए था और वे महाशय विवाह को प्रचारित कर उनके भोग-विलास की सीमा को सीमित कर रहे थे. क्लोडियस ने उनसे अपना ये अभियान बंद करने को कहा किन्तु उन महाशय ने ये कहते हुए इससे इंकार कर दिया कि उस समय रोम के लोग किसी जानवर की भांति अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे और विवाह प्रथा उन्हें इंसान बनाने के लिए एक बेहतरीन शुरुआत थी. जैसी की उम्मीद थी, क्लोडियस ने उन्हें सरेआम फांसी देने का दंड सुनाया. सन १९५० तक यूरोप में फांसी की सजा सरेआम ही दी जाती थी. वैसा हीं हुआ. उन महाशय ने जिन जिन लोगों की शादियाँ करवाई थी उन सब की आँखों के सामने १४ फरवरी सन २६९ को उन महाशय को सूली पर चढ़ा दिया गया. उनका नाम था “संत वैलेंटाइन”.

वैलेंटाइन नहीं रहे लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था. उनके अनुयायियों ने उनकी बरसी के दिन “वैलेंटाइन डे” मानना शुरू कर दिया. उस दिन रोम में अगर किसी पुरुष को कोई महिला अथवा किसी महिला को कोई पुरुष पसंद आता था तो वे उनके पास जाकर उन्हें कहते थे “Will you be my Valentine?” इसका वास्तविक अर्थ होता था “क्या आप मुझसे शादी करेंगी अथवा करेंगे?” ये इतना बड़ा परिवर्तन था कि उस दिन के बाद से वैलेंटाइन डे धीरे-धीरे पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गया. समय बीता और पश्चिम की बांकी संस्कृतियों के साथ वैलेंटाइन डे ने भारत में प्रवेश किया, लेकिन किस रूप में ये बताने की कोई आवश्यकता नहीं है. भारत में करोडो लोग हर साल वैलेंटाइन डे मानते हैं किन्तु उसके पीछे कितना पवित्र उद्येश्य था उसका ज्ञान किसी को नहीं. कोई ये नहीं जानता और कोई ये जानना भी नहीं चाहता कि आखिर वो वैलेंटाइन डे मना किस लिए रहे है? सच तो ये है कि भारत में वैलेंटाइन डे केवल गुलाब, चॉकलेट्स और उपहारों तक हीं सीमित रह गया है.

ऐसा नहीं है कि वैलेंटाइन डे का इतिहास केवल मुझे मालूम है. गूगल पर खोजिये और आपको इसका पूरा इतिहास मिल जाएगा. श्री राजीव दीक्षित ने इसके बारे में एक सभा की थी पर अफ़सोस उसे मीडिया में जगह नहीं मिली. मिडिया के प्रति मेरा गुस्सा भी उनके दोतारफे रवैये के लिए है. जो मिडिया बड़े से बड़े राज को खोज लेती है वही मिडिया कभी भी इस दिन के पीछे की सच्चाई को नहीं दिखाती. दरअसल दिखा भी नहीं सकती. अगर सब लोग इस दिन के पीछे छुपे उद्येश्य को जान लेंगे तो वैलेंटाइन डे के नाम पे जो ये बेवकूफी हो रही है वो बंद हो जाएगी जिसका सबसे ज्यादा असर इससे होने वाले व्यापार पर पड़ेगा. और ये रकम कितनी बड़ी है उसका अंदाजा आप सिर्फ इससे लगा सकते हैं कि इस साल वैलेंटाइन डे पर केवल गुलाबों की बिक्री से करीब २००० करोड़ रूपये के व्यापार की सम्भावना है. सिर्फ गुलाबों से. बांकी उपहारों की कीमत का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं. सच हीं तो है, देश की संस्कृति से किसी को क्या लेना देना? संस्कृति भाड़ में जाये पर हजारों करोड़ का नुक्सान नहीं होना चाहिए.

आप सभी कृपया ये न समझें कि इस पोस्ट को लिखने का मेरा मकसद आपके वैलेंटाइन डे के आयोजनों को बर्बाद करना है. आप चाहे वैलेंटाइन डे मनाएं या इंडिपेंडेंस डे, उससे मेरा कोई लेना देना नहीं है. इस लेख को लिखने का मेरा मकसद केवल इतना है कि कम से कम आप इस विशेष दिन के पीछे छुपे विशेष मकसद को समझे. अगली बार जब आप किसी के कहने वाले हों “Will you be my Valentine?”, आपको पता होना चाहिए कि आखिर इसका मतलब क्या है. आजकल छोटे छोटे बच्चे अपने माता पिता तक को वैलेंटाइन कार्ड्स दे देते हैं. वे इसे क्या समझते हैं मुझे नहीं मालूम पर इस बेवकूफी को क्या कहें कुछ समझ में नहीं आता? प्रेमी प्रेमिका होना किसी भी तरह से गलत नहीं है लेकिन वैलेंटाइन डे सिर्फ गुलाब, चोकोलेट्स और उपहारों तक सीमित नहीं है. इसका वास्तविक अर्थ है सच्चा प्रेम और अपने प्रेम को विवाह का रूप देकर एक मंजिल तक पहुचाना. इस पोस्ट को पढने के बाद अगर कोई एक युगल भी वैलेंटाइन डे की असली भावना को समझ सका तो मैं समझूंगा इसे आपतक पहुचाना सार्थक रहा. अगर इस लेख में आपको थोड़ी भी सच्चाई दिखे तो कृपया इसे शेयर करें. यही आपकी सबसे बड़ी सहायता होगी.